सनातन धर्म में उपवास रखने की प्रथा सनातन धर्म के शास्त्रों में बहुत पहले लिखी जा चुकी है, जिसका वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है, शास्त्रों के अनुसार उपवास रखने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शारीरिक तथा मानसिक तीनों प्रकार से लाभ मिलता है।
अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस पर नजर डालते हैं
वर्ष 2016 में मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार जापान के एक वैज्ञानिक “योशिनोरी ओहसुमी” को मिला, उनको यह पुरस्कार “ऑटोफैजी ” के सिद्धांत के लिए दिया गया था
ऑटोफैजी एक ग्रीक शब्द है जिसका मतलब है खुद को का जाना। योशिनोरी ओहसुमी के अनुसार अगर हमारे शरीर में ऑटोफैजी स्टार्ट हो जाती है तो शरीर खुद के अंदर के खराब तथा अतिरिक्त सेल्स तथा गंदगी को खाने लगता है जिससे कैंसर तथा अन्य कई बीमारियों में यह लाभकारी साबित हो सकता है।
अब सवाल यह उठता है कि हमारे शरीर में ऑटोफैजी स्टार्ट कैसे होती है?
इसका उत्तर है उपवास से, जब हमारे शरीर को कुछ घंटे या यू कहे कि कम से कम 12 से 18 घंटे जब कुछ खाने को नहीं मिलता तो हमारे शरीर में ऑटोफैजी अपने आप स्टार्ट हो जाती है ऑटोफैजी की प्रक्रिया में शरीर खुद के अंदर जमा अतिरिक्त सेल्स को खा करके उनसे ऊर्जा प्राप्त करने का कार्य करते हैं, इस प्रक्रिया से शरीर हमारे शरीर के अंदर अतिरिक्त सेल्स तथा विषाक्त पदार्थ को खुद नष्ट कर देता है जिससे कैंसर तथा अन्य रोगों का इलाज संभव है।
अभी हाल में ही हमने दो कैंसर सरवाइवर लोगों के बयान सुने उनमें से एक है नवजोत सिंह सिद्धू उनकी पत्नी को कैंसर था तथा दूसरी है भारतीय अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे इन दोनों ने अपने बयान में उपवास तथा ऑटोफेजी का भी जिक्र किया है।
उपवास बहुत ही वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है जो यह सिद्ध करता है कि सनातन धर्म आध्यात्मिक के साथ-साथ बहुत ही वैज्ञानिक भी है।